Thursday, July 12, 2012

Essence of Murli 12-07-2012

Essence: Sweet children, you must never become tired of studying. Be tireless. To be tireless means to reach the karmateet stage. 

Question: What have you children promised and why? 

Answer: You have promised: I will never cause sorrow for anyone. I will show everyone the path to happiness. 

Question: Which children are sustained by the yagya? 

Answer: Those who consider themselves to be trustees, that is, those who completely surrender themselves from the heart. They stay in a household, they carry on with their business, but are trustees. Then, it is as though they are eating from Shiv Baba's treasure store. 

Song: You are the Mother and the Father. 

Essence for dharna: 
1. Follow the Mother and Father and sustain everyone with knowledge and yoga. Keep yourself under that sustenance. Become intense in knowledge and yoga. 
2. Eat food prepared by those who are pure and yogi. In order to purify the intellect, take great precautions about your diet. 

Blessing: May you be a true server who achieves success while doing service with total surrender. 

A true server is one who serves with total surrender. There shouldn’t be the slightest consciousness of “mine” in service. Where there is the consciousness of “mine,” there cannot be success. When someone thinks, “This is my work, this is my idea, this is my duty,” then this consciousness of “mine” creates attachment. However, wherever you may be staying, always have the awareness of being an instrument – “This home is not mine but it is a place for service.” Then, with the consciousness of “total surrender” you will become humble and a destroyer of attachment and achieve success in service. 

Slogan: Always remain seated on your seat of self-respect and all the powers will continue to obey your orders. 


मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - तुम्हें पढ़ाई में कभी थकना नहीं है, अथक बनना है, अथक बनना अर्थात् कर्मातीत अवस्था को पाना'' 

प्रश्न: तुम बच्चों ने अभी कौन सी प्रतिज्ञा की है और क्यों? 

उत्तर: तुमने प्रतिज्ञा की है कि किसको भी दु:ख नहीं देंगे। सबको सुख का रास्ता बतायेंगे। 

प्रश्न:- किन बच्चों की पालना यज्ञ से होती है? 

उत्तर:- जो अपने को ट्रस्टी समझते हैं अर्थात् पूरा दिल से सब कुछ सरेन्डर करते हैं। वह रहते भी गृहस्थ व्यवहार में हैं, धन्धा भी करते हैं लेकिन ट्रस्टी हैं। तो जैसे शिवबाबा के खजाने से खाते हैं। 

गीत:- तुम्हीं हो माता... 

धारणा के लिए मुख्य सार: 
1) मात पिता को फालो करते हुए ज्ञान-योग से सबकी पालना करनी है। उसी पालना में रहना है। ज्ञान योग में तीखा जाना है। 
2) पवित्र और योगिन के हाथ का भोजन खाना है। बुद्धि को शुद्ध बनाने के लिए भोजन की बहुत परहेज रखनी है। 

वरदान: समर्पण भाव से सेवा करते सफलता प्राप्त करने वाले सच्चे सेवाधारी भव 

सच्चे सेवाधारी वह हैं जो समर्पण भाव से सेवा करते हैं। सेवा में जरा भी मेरे-पन का भाव न हो। जहाँ मेरापन है वहाँ सफलता नहीं। जब कोई यह समझ लेते हैं कि यह मेरा काम है, मेरा विचार है, यह मेरी फर्ज-अदाई है-तो यह मेरापन आना अर्थात् मोह उत्पन्न होना। लेकिन कहाँ भी रहते सदा स्मृति रहे कि मैं निमित्त हूँ, यह मेरा घर नहीं लेकिन सेवा-स्थान है तो समर्पण भाव से निर्माण और नष्टोमोहा बन सफलता को प्राप्त कर लेंगे। 

स्लोगन: सदा अपने स्वमान की सीट पर रहो तो सर्व शक्तियां आर्डर मानती रहेंगी। 


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